Sunday, May 12, 2013

दुबक के रात आती है


दुबक के रात आती है
छुप के तकिये के नीचे से
उलट पलट के ख़यालों को
कहानी की शक्ल दे जाती है।
कुछ बूढ़े
कुछ जवां से ख़्वाब
पाल के रखे थे जो,
पलंग के पाये
से बाँध छोड़े थे जो।
अधूरे टूटे से ख्वाब
लपक के पकड़ लेते हैं
दुबक के जब रात आती है। 

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