फ़टा पैराहन
देख के मेरा
दोस्त हो गए हैं ग़ायब।
लगता है
निकलना पड़ेगा
इस देश से
बदल के अपना जामा।
कभी कोनों से
कभी बीचों-बीच,
फट जाती है
चादर मेरी मटमैली।
रफ़ूगर के पास
खोला है खाता
धागों के साथ
उधार ली है
थोड़ी उम्मीद।
बाँध-बाँध के
जोड़-जोड़ के
कतरनों से
गर बन जाए
मेरी चादर सुनहरी,
तो ओढ़ के उसको
मैं भी सोच लूंगी
कि मेरे आँगन में
आज थोड़ी धूप है निकली।