कभी कोनों से
कभी बीचों-बीच,
फट जाती है
चादर मेरी मटमैली।
रफ़ूगर के पास
खोला है खाता
धागों के साथ
उधार ली है
थोड़ी उम्मीद।
बाँध-बाँध के
जोड़-जोड़ के
कतरनों से
गर बन जाए
मेरी चादर सुनहरी,
तो ओढ़ के उसको
मैं भी सोच लूंगी
कि मेरे आँगन में
आज थोड़ी धूप है निकली।
1 comment:
Waah, waah!
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